{"product_id":"satta-sanskriti-ka-varchasvavadi-vimarsh-aur-dalit-hardcover-hindi-edition","title":"Satta Sanskriti Ka Varchasvavadi Vimarsh Aur Dalit [hardcover] [hindi edition]","description":"सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र पुस्तक सूरज बड़त्या की विश्लेषणपरक विमर्शवादी आलोचना दृष्टि का परिचय देती है। दलित आंदोलन, दलित वैचारिकी एवं दलित मुक्ति का प्रश्न आज भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। सामाजिक न्याय, आर्थिक बराबरी और सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष की प्रतिबद्धता समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य में नयी चुनौतियों, नयी अंतर्वस्तु एवं नए शिल्प के साथ यथास्थितिवाद को प्रश्नांकित कर रही है। हिंदी में दलित रचनाकारों का लेखन, परिवर्तनकारी साहित्यिक आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने दलित सौंदर्यशास्त्र के मूल्यों और प्रतिमानों की तर्कसंगत व्याख्या की है।\u003cbr data-mce-fragment=\"1\"\u003e\u003cbr data-mce-fragment=\"1\"\u003eप्राचीन भारतीय संस्कृति की तथाकथित महानता के भंडाफोड़ का सबसे पहला अभियान सिद्धनाथ कवियों तथा भक्ति आंदोलन के संत कवियों ने किया था जिसके अंतर्गत वर्णाश्रम व्यवस्था की भर्त्सना और बराबरी का दावा किया गया था। परंतु सत्ता संस्कृति ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध प्रतिरोध के आंदोलनों की मनगढ़ंत व्याख्या करके विद्रोह की धार को कुंद कर देती है। बौद्ध धर्म के • अनेक विचारों को भी नव्यवेदांतियों ने इसी प्रकार हड़प लिया था। आधुनिक काल में प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन की भी तमाम तरह की व्याख्याएं उसे बदनाम करने के प्रयास के रूप में आज तक जारी हैं। सूरज बड़त्या ने इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दलित विमर्श की गहरी पड़ताल कर यह सिद्ध किया है कि 'साहित्य की वर्चस्ववादी सांस्थानिक शक्ति' का इस्तेमाल ब्राह्मणवादी वैचारिकी ‘सत्ता संस्कृति' के संरक्षण में करती है।\u003cbr data-mce-fragment=\"1\"\u003e\u003cbr data-mce-fragment=\"1\"\u003eकबीर तथा अन्य संत-कवियों को सामाजिक क्रांति के अग्रदूत के रूप में स्वीकार न कर उनके साहित्यिक अवदान को कम करने की आलोचना प्रवृत्ति से सभी परिचित हैं। इसीलिए आज यह जरूरी और अपरिहार्य दायित्व है कि दलित चेतना द्वारा साहित्य के मूल्यांकन की कसौटी तय की जाए। इन रचनाओं के सौंदर्यशास्त्र को परिभाषित किया जाए। इस चुनौती और कार्यभार को लेखक ने सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र पुस्तक में अपने अध्ययन और विवेचन का मुख्य बिंदु बनाया है। इस पुस्तक के स्थापित निष्कर्ष यह हैं कि दलित सौंदर्यशास्त्र भारतीय काव्यशास्त्र के रस, अलंकार जैसे प्रतिमानों को अस्वीकार करता है। इसके साथ ही रीतिवादी, भोगवादी या आधुनिक कलावादी मूल्यों को अमान्य करता है। इस साहित्य का प्रयोजन यश, काम और अर्थ नहीं है। यह साहित्य दलित समाज के साथ पूरी उत्पीड़ित मानवजाति की स्वतंत्रता और मुक्ति का साक्षी है। विद्रोह, प्रतिरोध और अस्वीकार उसके अभीष्ट हैं। नई यथार्थवादी सौंदर्य दृष्टि का चित्रण ही दलित साहित्य का मुख्य एजेंडा है।","brand":"Best of Used books","offers":[{"title":"Used","offer_id":44270288109825,"sku":"2VB3M14W1-Used","price":199.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0421\/4299\/0495\/files\/b18bab7b-5d1f-4184-b8c7-2f98ea72dec0.jpg?v=1699524821","url":"https:\/\/bestofusedbooks.com\/products\/satta-sanskriti-ka-varchasvavadi-vimarsh-aur-dalit-hardcover-hindi-edition","provider":"Best Of Used Books","version":"1.0","type":"link"}