{"product_id":"premchand-ki-sampuran-kahaniya-volume-1-hindi","title":"Premchand ki sampuran kahaniya (Volume:1) [hindi]","description":"\u003cp\u003eप्रेमचंद की कहानियों के विषय में....... जब हम एक बार लौटकर हिन्दी कहानी की यात्रा पर वृद्धि डालते हैं और पिछले सत्तर-अपसो वर्षों के सामाजिक विकास की व्याख्या करते हैं, तो अगर कहना चाहे तो बहुत सुविधापूर्वक कह सकते हैं कि कहानी अब तक प्रेमचंद से चावकर प्रेमचन्द तक ही पहुंची है। अर्थात् सिर्फ प्रेमचंद के भीतर ही हिन्दी कहानी के इस लम्बे समय का पूरा सामाजिक वृत्तान्त समाहित है। समय की अर्थवत्ता जो सामाजिक सन्दर्भों के विकास से बनती है, वह आज भी बहुत साधारण परिवर्तनों के साथ जस-का-तस बनी हुई है। आप कहेंगे कि क्या प्रेमचंद के बाद समय जहाँ-का-तहाँ टिका रह गया है? क्या समय का यह कोई नया स्वभाव है? नहीं, ऐसा नहीं। फिर भी सन्दर्भों के विकास को प्रक्रिया को सांस्थानिक परिवर्तनों से ही रेखांकित होती है और समय ही उसका कारक है-वाह नहीं के बराबर हुई। आधारभूत सामाजिक बदलाव नहीं हुआ। इस लम्बे काल में नया समाज नहीं बन पाया। धार्मिक अन्धविश्वास और पारम्परिक कुण्ठाएँ जैसी-की-तैसी बनी रहीं। भूमि-सम्बन्ध नहीं बदले। अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों का अन्धकार लगातार छाया रहा।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयत्र-तत्र परिस्थितियों और परिवेश के साथ ही सामान्य सामाजिक परिवर्तन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियों को छोड़ दें तो शिल्प के क्षेत्र में भी जहाँ सीधे- सादे वावन में 'पूस की रात', 'काफन', 'सद्गत्ति' जैसी कहानियाँ वर्तमान हों, कोई परिवेश अच्या परिवर्तन की बारीक लक्षणा और चरित्रांकन की गहराई यो लिए किसी दूसरी कहानी का नाम लें तो भी इन कहानियों को छोड़‌कर नहीं ले सकता। अपने समय और समाज का ऐतिहासिक सन्दर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Best Of Used Books","offers":[{"title":"Used","offer_id":45708426838273,"sku":"3269KCC8X-Used","price":150.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0421\/4299\/0495\/files\/1_a47aa542-624e-4811-a8d3-7734f09da36d.jpg?v=1730362032","url":"https:\/\/bestofusedbooks.com\/products\/premchand-ki-sampuran-kahaniya-volume-1-hindi","provider":"Best Of Used Books","version":"1.0","type":"link"}